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Seer Kesavananda Bharati: क्यों केशवानंद भारती मामले को नज़ीर माना जाता है?

देश के न्यायिक इतिहास में केशवानंद भारती (Kesavananda Bharati) काफी जाना-पहचाना नाम हैं. साल 1973 में ‘केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य’ मामले में सुप्रीम कोर्ट में चली सुनवाई के बाद वे काफी चर्चित हुए थे. दक्षिण भारत के इस संत, जिन्हें केरल के शंकराचार्य का भी दर्जा मिला हुआ था, का रविवार सुबह निधन हो गया. 79 साल के संत कासरगोड़ में एडनेर मठ के प्रमुख थे. जानिए, कौन थे संत केशवानंद भारती और क्यों उन्हें महत्वपूर्ण माना जाता है.

एडनेर स्थित शैव मठ को काफी प्राचीन माना जाता है. कहा जाता है कि इसका आदिगुरु शंकराचार्य से संबंध था. संत केशवानंद इसी मठ के प्रमुख थे. केवल 20 साल की उम्र में अपने गुरु के देहांत के बाद केशवानंद ने इस मठ का जिम्मा संभाला था. उनके साथ ही ये मठ लगातार चर्चाओं में रहा. इसकी वजह सिर्फ आध्यात्मिक नहीं थी, बल्कि मठ के जरिए केरल ने नाटक और नृत्य की परंपरा को भी बढ़ावा दिया. हालांकि एक बहुत खास वजह से संत केशवानंद का नाम याद किया जाता है.

असल में केरल की तत्कालीन सरकार ने भूमि सुधार मुहिम के तहत जमींदारों से तो जमीनें ली हैं, इस मठ की जमीन को भी सरकारी कह दिया. सरकार का तर्क था कि वो जमीनें लेकर आर्थिक गैर-बराबरी कम करने की कोशिश कर रही है. इस सरकारी फैसले को तब युवा संत ने चुनौती दे दी.

केवल 20 साल की उम्र में अपने गुरु के देहांत के बाद केशवानंद ने मठ का जिम्मा संभाल लिया था

साल 1970 में संत केशवानंद ने कोर्ट में एक याचिका डाली. इसके तहत अनुच्छेद 26 का हवाला देते हुए उन्होंने तर्क दिया कि मठाशीध होने के नाते उन्हें अपनी धार्मिक प्रॉपर्टी को संभालने का हक है. यहां तक कि संत ने स्थानीय और केंद्र सरकार के कथित भूमि सुधार तरीकों को भी चुनौती दी. हालांकि वे केरल हाईकोर्ट में काम नहीं बना, तब संत केशवानंद सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए.

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देखा गया कि मामले से कई संवैधानिक सवाल जुड़े हुए थे. यही देखते हुए मामले को प्राथमिकता से निपटाने की सोची गई. इसके साल साल 1972 के आखिर में लगातार 68 दिनों तक हीयरिंग चली. 13 न्यायाधीशों की पीठ का गठन किया गया, जिसके खिलाफ कानूनविद नानी पालकीवाला, फली नरीमन, सोली सोराबजी ने सरकार के खिलाफ मामला पेश किया.

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आखिरकार 23 मार्च 1973 को 703 पन्नों का लंबा-चौड़ा फैसला सुनाया गया. इस फैसले में कई तरह के अलग-अलग मत थे. लेकिन अंत में 7:6 के मामूली बहुमत से ये माना गया कि संसद संविधान के किसी भी हिस्से में उसी हद तक बदलाव कर सकती है, जहां वे संविधान के बुनियादी ढांचे पर असर न डालें. हालांकि अदालत में स्वामी केशवानंद नहीं जीत सके थे लेकिन ये मामला आज भी मिसाल माना जाता है. तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद यह सिद्धांत अभी भी कायम है. यानी संसद के पास संविधान को संशोधित करने की शक्ति है, बशर्ते संविधान के बेसिक स्ट्रक्चर को न बदला गया हो.

संविधान के बेसिक्स पर बात करने के कारण ये मामला उन दिनों अखबारों की सुर्खियां बना रहा- सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)

संविधान के बेसिक्स पर बात करने के कारण ये मामला उन दिनों अखबारों की सुर्खियां बना रहता था. ये केस आज भी सबसे लंबी चली सुनवाई के तौर पर जाना जाता है. एक मठ प्रमुख होने के बाद भी स्थानीय और केंद्र सरकार को चुनौती देने के कारण स्वामी केशवानंद को साल 2018 मे जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर सम्मान मिला. इसके अलावा इस संत ने अपने मठ के जरिए ही स्थानीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार का काम किया. मठ पर सबसे लंबे चले कार्यकाल, लगभग 59 सालों के दौरान उन्होंने कई स्कूल खुलवाए, जहां बेसिक के साथ-साथ एडवांस और अल्टरनेटिव शिक्षा भी दी जाती है. साथ ही केरल का नृत्य-संगीत भी सिखाया जाता है. मठ की केरल और कर्नाटक दोनों ही राज्यों में काफी मान्यता है.

आज भी कई बार ये बात निकलती है कि क्या संसद इतनी ताकतवार है कि वो संविधान में मनचाहे बदलाव कर सकती है. जैसे साल 2019 में नागरिकता संशोधन बिल पर कांग्रेसी नेता पी चिदंबरम ने कहा था कि ये बिल असंवैधानिक है और इसके खिलाफ लड़ाई लड़ी जाएगी. यानी एक तरह से संसद में संविधान बदलने की बात की जा रही थी. तब भी सुप्रीम कोर्ट के केशवानंद भारती मामले को किसी नजीर की तरह पेश किया गया था कि क्यों संविधान से छेड़छाड़ नहीं हो सकती.


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