युवक ने हाथ गंवा दिए पर हौसला कायम, पैरों से कंप्यूटर चला कर पेश की मिसाल

कहते हैं कि भगवान एक रास्ता बंद करता है तो दूसरा खोल देता है। बस हौंसला नहीं छोड़ना चाहिए। यह उक्ति चित्तौड़गढ़ जिले की भदेसर तहसील के खोडिप गांव के दिव्यांग शांतिलाल शर्मा पर पूरी तरह चरितार्थ हो रही है। 12 वर्ष पहले दुर्घटना में दोनों हाथ खो देने वाले शांतिलाल ने नई मिसाल पेश की। करीब 12 वर्ष पूर्व 7 नवंबर 2008 को 11000 केवी हाई टेंशन लाइन पर काम करते वक्त हुई दुर्घटना में दोनों हाथ खो देने वाले शांतिलाल के पास हौसला व जीवट सुरक्षित था। हालांकि तब शायद उन्होंने यह सोचा भी नहीं होगा कि इस विषम परिस्थिति से निकलकर वह जीवन में ऐसा मुकाम हासिल करेंगे कि लोग उनकी मिसाल दें। लेकिन हादसे के बाद परिजनों व गांव के लोगों ने प्रेरणा दी।

शांतिलाल कहते हैं कि हाथ गंवाने के बाद भी उन्होंने हौसला नहीं छोड़ा तो इसका सबसे बड़ा आधार उनकी पत्नी मंजू देवी शर्मा थीं। ग्रामीणों की प्रेरणा पर वे वर्ष 2014 में चुनाव लड़ भदेसर पंचायत समिति के सदस्य भी बने। पत्नी हमेशा यह कह उनका हौसला बढ़ाती थीं कि हाथ चले गए तो क्या भगवान से मिले पैर तो पास में है। एड.एट.एक्शन के लाइवलीहुड एजुकेशन के प्रोग्राम डायरेक्टर डॉ ऐश्वर्य महाजन के अनुसार शांतिलाल की प्रेरक कहानी जीवन में सफलता पाने के लिए उनकी लगन और समर्पण को दर्शाती है। आईलीड संस्था सुविधाओं से वंचित युवाओं को जीविकोपार्जन के योग्य बनाने की दिशा में ऐड एट एक्शन कार्यक्रम चल रही है।

वर्ष 2008 में जब हादसा हुआ तो शांतिलाल के जीवन में बड़ी मुश्किल आई। गंभीर जख्म के बाद उपचार के लिए भारी खर्च भी उठाना पड़ रहा था ।इन सब से थक कर उन्होंने आशा खो दी थी। फिर वर्ष 2010 में जन सुनवाई के दौरान वे तत्कालीन जिला कलेक्टर डॉ. आरुषि मलिक से मिले। मलिक ने अपने पैरों से मोबाइल चलाते देखा तो लगा कि वह कंप्यूटर भी चला लेंगे। इस पर उसने हौंसला कायम रखने और आईलीड चित्तौड़गढ़ के पास जाने की सलाह दी।

आरूषी मलिक द्वारा आगे बढ़ने की राह से उनकी हिम्मत, गैर सरकारी संस्था एड एट एक्शन द्वारा चलाए रहे लाइवलीहुड जनरेशन प्रोग्राम के जरिए मार्गदर्शन मिला तो जैसे नया जीवन मिल गया। शांतिलाल अब अपनी पत्नी के सहयोग से अपने गांव में ई-मित्र केंद्र सीएससी कॉमन सर्विस सेंटर संचालित कर रहे हैं। उनका सेंटर चित्तौड़गढ़ की दो प्रमुख बैंक शाखाओं के लिए डेटा संग्रह केंद्र के रूप में काम करता है। शांतिलाल के अनुसार विभिन्न संस्थाओं के प्रयास से सरकार की ओर से कंप्यूटर प्रदान किया गया। इसके बाद उन्होंने खुद का व्यवसाय शुरू कर दिया। शुरू में लोगों को लगता था केवल पैर से कैसे कंप्यूटर का काम करेंगे लेकिन अब वे प्रिंट लेने और फोटो कॉपी करने जैसे कार्य भी कर लेते हैं।

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