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बिहार चुनाव : BJP और JDU में सबसे बड़ी पार्टी बनने की खींचतान, दलित वोट पर दोनों की नजर

केंद्रीय मंत्री आरके सिंह, गिरिराज सिंह, नित्यानंद राय और पूर्व केंद्रीय मंत्री संजय पासवान जैसे भाजपा नेताओं के एक वर्ग का मानना ​​है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी को आगामी बिहार चुनाव जीतने जीतने का अच्छा मौका है.

Bihar Assembly Election: वास्तव में दलित वोटों की इस लड़ाई के पीछे मुख्य उद्देश्य है राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बनना. नीतीश कुमार के लिए ये चुनाव 2025 तक मुख्यमंत्री बनने का आखिरी मौका होगा.

(अशोक मिश्रा)

पटना. बिहार में इन दिनों चुनाव (Bihar Assembly Election) से पहले एनडीए के दो धड़े BJP और जनता दल यूनाइडेट (JDU) के बीच दलित वोट के लिए खींचतान मची है. ऐसा लग रहा है कि दोनों दलों के बीच सीटों के मामले में सबसे बड़ी पार्टी बनने की होड़ सी मची है. 243 सीटों वाली विधान सभा में मैजिक नंबर 122 का है और दोनों पार्टियां इसके करीब पहुंचना चाहती हैं. बीजेपी ये लड़ाई लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) के जरिए लड़ रही है. जबकि इस जंग में जेडीयू ने हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) का हाथ थामा है. लोक जनशक्ति पार्टी एनडीए की पुराने साथी रही है. जबकि हाल ही में HAM के प्रमुख और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने ऐलान किया है कि वो नीतीश कुमार की पार्टी JDU से हाथ मिला रहे हैं.

JDU बनाम LJP
मांझी के इस फैसले को केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान और उनके बेटे चिराग से मुकाबला करने के लिए एक रणनीतिक चाल के तौर पर देखा जा रहा है. दरअसल हाल के दिनों में चिराग ने कई बार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर निशाना साधा है. उन्होंने कोरोना वायरस के मुद्दे पर नीतीश की आलोचना की है. लोजपा ने हाल के दिनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की तारीफ की है. साथ ही कहा कि वो जदयू उम्मीदवारों के खिलाफ अपने उम्मीदवार उतारेंगे. हाल ही में, लोजपा ने अखबारों में विज्ञापन छपवाया था. जहां मौजूदा सरकार पर निशाना साधते हुए लिखा गया था, ‘हम बिहार के गौरव के लिए लड़ रहे हैं, जबकि वो हम पर शासन करने के लिए लड़ रहे हैं.’ जीतन राम मांझी ने चिराग के इस बयान की आलोचना की है. साथ ही कहा कि इससे नीतीश को और मजबूती मिलेगी.

मांझी को लेकर मझधार में JDU

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दलित वोट पर नज़र है पार्टियों की

मांझी ने 2015 में जेडी (यू) छोड़ दिया था. दरअसल नीतीश कुमार को सीएम बनाने के लिए ये उन्हें पद छोड़ना पड़ा था. इसके बाद उन्होंने HAM का गठन किया और NDA के घटक के रूप में 2015 के बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान 21 सीटों पर चुनाव लड़ा. जुलाई 2017 में एनडीए के पाले में कुमार की वापसी के साथ, वह विपक्षी ग्रैंड अलायंस के साथ हाथ मिलाने के लिए इससे निकल गए. साल 2010 के विधानसभा चुनावों से पहले, नीतीश कुमार ने 21 जातियों को महादलितों के रूप में बांटते हुए अनुसूचित जातियों को विभाजित कर दिया था, जो दुसाध (पासवान) को छोड़कर चले गए थे. उन्होंने महादलितों के कल्याण के लिए कुछ उपायों की घोषणा की और उन्हें घर के लिए एक तीन-दशमलव भूखंड (1,306.8 वर्ग फुट) दिया.

दलित वोट पर नज़र है पार्टियों की

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दलित को लुभाने के लिए नीतीश की चाल!

अनुसूचित जातियों को लुभाने के लिए नीतीश कुमार ने एक और चाल चली. कुमार ने इस बार एक्सिडेंट के दौरान मौत होने पर SC या ST व्यक्ति के परिजनों को नौकरी देने का आदेश दिया. उन्होंने 20 सितंबर तक अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत लंबित मामलों के निपटाने का भी आदेश दिया. इस कदम की विपक्षी दलों ने तीखी आलोचना की. इनका तर्क था कि लोग अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी के लिए अपने परिवारवालों की हत्या कर सकते हैं. राजद नेता तेजस्वी प्रसाद यादव ने कुमार पर विधानसभा चुनाव से पहले दलित कार्ड खेलने का आरोप लगाते हुए कहा कि इससे राज्य में एससी और एसटी लोगों की हत्याओं को बढ़ावा मिलेगा. उन्होंने ये भी सवाल किया कि सामान्य और पिछड़े समुदाय के लोगों को क्यों छोड़ दिया गया है.

दलित को लुभाने के लिए नीतीश की चाल!

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एंटी इनकंबेंसी फैक्टर का डर!

वास्तव में दलित वोटों की इस लड़ाई के पीछे मुख्य उद्देश्य है राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बनना. नीतीश कुमार के लिए ये चुनाव 2025 तक मुख्यमंत्री बनने का आखिरी मौका होगा. लेकिन कोरोनो वायरस संकट के मद्देनजर लाखों प्रवासियों की भीड़ को संभालने में कथित देरी के लिए उन्हें एंटी इनकंबेंसी फैक्टर का भी सामना करना पड़ सकता है.

एंटी इनकंबेंसी फैक्टर का डर!

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नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चुनाव!

दूसरी ओर, केंद्रीय मंत्री आरके सिंह, गिरिराज सिंह, नित्यानंद राय और पूर्व केंद्रीय मंत्री संजय पासवान जैसे भाजपा नेताओं के एक वर्ग का मानना ​​है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी को आगामी बिहार चुनाव जीतने का अच्छा मौका है. उन्हें जनता के बीच बड़े पैमाने पर समर्थन हासिल है. केंद्रीय मंत्री आरके सिंह ने हाल ही में कहा,  ‘बिहार में भाजपा अपने दम पर सरकार बना सकती है. इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए. हमारी पार्टी और हमारे नेता नरेंद्र मोदी का समर्थन आधार बिहार में ठोस है. लेकिन हम 1996 में बने जेडी (यू) के साथ अपने गठबंधन का सम्मान करते हैं. हम गठबंधन को तोड़ने नहीं जा रहे हैं.’

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चुनाव!

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नीतीश बनाम पीएम मोदी

मोदी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में नामित किए जाने के बाद नीतीश ने 2013 में भाजपा के साथ अपने 17 साल पुराने संबंधों को तोड़ दिया था. नीतीश 2014 के लोकसभा चुनाव अकेले लड़े और लगभग 16 फीसदी वोट शेयर के साथ सिर्फ दो सीटें जीत सके. उन्होंने लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व वाले राजद के साथ हाथ मिलाया था और 2015 का विधानसभा चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बने थे. लेकिन इसने गठबंधन को तोड़ दिया और 2017 में फिर से एनडीए में शामिल हो गए. जेडी (यू) और बीजेपी ने लोकसभा चुनाव लोजपा के साथ मिलकर लड़ा और 40 में से 39 सीटें जीतीं.

नीतीश बनाम पीएम मोदी

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BJP VS JDU: रिश्तों में खटास!

हालांकि बाद में उनके रिश्ते खराब हो गए, क्योंकि भाजपा ने जद (यू) को केवल एक कैबिनेट बर्थ की पेशकश की. जेडी (यू) नेता ने सहयोगी दल के बीच दरार पैदा करते हुए प्रस्ताव को रद्द कर दिया. हालांकि, बीजेपी ने ऐलान किया है कि वो नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार का चुनाव लड़ेगी. बिहार में राजनीति एक ऐसे मुकाम पर पहुंच गई है, जहां नेतृत्व की लड़ाई लड़ी जा रही है. इस बात को ध्यान में रखते हुए, भाजपा और जद (यू) के वरिष्ठ नेता इस विवाद को खत्म करने की कोशिश कर रहे हैं.

BJP VS JDU: रिश्तों में खटास!

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