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जादवपुर विश्वविद्यालय की प्रोफेसर को परीक्षाओं का विरोध करने के लिए दी गईं जातिवादी गालियां

जादवपुर यूनिवर्सिटी की फाइल फोटो

परेशानियां 2 सिंतबर को तब शुरू हुईं, जब मुर्मू, जो आदिवासी समुदाय (Tribal Community) से हैं, उन्होंने अंतिम वर्ष और टर्मिनल सेमेस्टर के छात्रों के लिए पारंपरिक परीक्षा आयोजित करने के विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के फैसले के बारे में सोशल मीडिया (Social Media) पर चिंता व्यक्त की.

(सुजीत नाथ)

कोलकाता. जादवपुर विश्वविद्यालय (Jadavpur University) की प्रोफेसर मरूना मुर्मू, जो कोविड-19 (COVID-19) के खतरे के चलते केंद्र के परीक्षा आयोजित कराने के फैसले के खिलाफ थीं, उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि उनके विचार सोशल मीडिया (Social Media) पर इतना बुरा प्रभाव लेकर आयेंगे. क्योंकि इसके बाद उन्हें अपने स्टैंड के लिए बुरी तरह से जातीय गालियों का सामना करना पड़ा. परेशानियां 2 सिंतबर को तब शुरू हुईं, जब मुर्मू, जो आदिवासी समुदाय (Tribal Community) से हैं, उन्होंने अंतिम वर्ष और टर्मिनल सेमेस्टर के छात्रों के लिए पारंपरिक परीक्षा आयोजित करने के विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के फैसले के बारे में सोशल मीडिया पर चिंता व्यक्त की.

उनकी पोस्ट पर बेथ्यून कॉलेज (Bethune College) की छात्रा, एक पारोमिता घोष की ‘बांग्ला’ भाषा (Bangla Language) में एक आपत्तिजनक टिप्पणी सहित विभिन्न लोगों की तीखी आलोचना आई. घोष ने लिखा, “यह आश्चर्यजनक है कि जादवपुर विश्वविद्यालय (Jadavpur University) में मरून मुर्मू जैसे प्रोफेसर हैं. मैं उनकी मानसिकता और जो स्टैंड (Stand) उन्होंने लिया (परीक्षाओं को करवाने के खिलाफ) मैं उससे चकित हूं. मैं उसे ‘कोटा’ (Quota) और ‘नो-कोटा’ के बीच का अंतर समझाना चाहूंगी.”

आदिवासी पहचान की याद दिलाते हुए लिखी पोस्टउसने आगे कहा, “यह जानने के लिए कि जीवन एक अकादमिक वर्ष की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण है, किसी को प्रोफेसर होने की आवश्यकता नहीं है. यह एक वर्ष पिछड़ने के बारे में नहीं है, लेकिन कुछ अयोग्य और अक्षम लोग आरक्षण प्रणाली और उनकी जाति का अनुचित लाभ उठाते हैं. अब उन्हें सफल होने में मदद मिल रही है, जब वे पिछड़ रहे हैं. जान जोखिम में डालकर, हमारे माता-पिता जीवित रहने के लिए बाहर निकल रहे हैं, भोजन की व्यवस्था करने के लिए, जबकि कुछ घर बैठे हैं और सैलरी पा रहे हैं.”

कॉलेज छात्रा ने अपने फेसबुक प्रोफाइल पर एक और पोस्ट डालते हुए कहा, “आज सुबह एक ‘मुर्मू’ एक संथाल को उसके आदिवासी वंश के बारे में की याद दिला दी. उसके जैसे कुछ लोग मुझे यह एहसास कराते हैं कि तथाकथित प्रोफेसर सिर्फ तनख्वाह ले लेकर मोटे हो रहे हैं.”

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इस तरह के हेट पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए मुर्मू ने कहा, “मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं बंगाल में जातिवादी टिप्पणी का सामना करूंगी. मैंने केवल यह कहा था कि जीवन लंबा है और COVID-19 की वजह से एक साल परीक्षाएं नहीं होतीं तो कुछ नहीं होगा.”


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