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कौन से देश अब भी Corona वैक्सीन का फॉर्मूला चुराने में लगे हैं?

कोरोना संक्रमण को खत्म करने के लिए वैक्सीन की होड़ में कई देश हैं. एक ओर रूस ने एक के बाद दो वैक्सीन उतार दी है, वहीं अमेरिका आए-दिन जल्द से जल्दी वैक्सीन लाने के दावे कर रहा है. चीन भी इस मामले में पीछे नहीं. खबरों के मुताबिक उसने अनौपचारिक तौर पर अपने सैनिकों और सरकारी लोगों को वैक्सीन देना शुरू भी कर दिया है. इस सबके बीच एक और होड़ चल रही है- वैक्सीन फॉर्मूला चुराने की होड़. हालत ये है कि कई देश वैक्सीन के लिए हैकिंग का सहारा ले रहे हैं.

चीन की बात करें तो ये देश पहले से ही कॉपी करने में बदनाम रहा है. ऐसे में ये भी खबरें आ रही हैं कि वो वैक्सीन के लिए हैकिंग कर रहा है. फर्स्टपोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक पहले चीनी हैकर्स ने कोरोना वायरस के लिए फार्मा कंपनियों को हैक करने की कोशिश की, जो प्रयोग का हिस्सा थीं. इससे काम नहीं बना तो हैकर सीधे उन यूनिवर्सिटी की डिजिटल सुरक्षा को तोड़ने में जुट गए, जहां वैक्सीन बन रही हैं.

कोरोना वायरस पर काम कर रहे ब्रिटिश इंस्टीट्यूट पर ईरान से साइबर अटैक किया गया- सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)

वैसे वैक्सीन का फॉर्मूला चुराने की फिराक में चीन अकेला नहीं. रूस इससे कहीं आगे जा निकला. जुलाई में अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा की साइबर सिक्योरिटी फोर्स ने कहा है कि रूस का APT-29 समूह उनकी प्रयोगशालाओं से वैक्सीन का फॉर्मूला चुराने की कोशिश में है.ये भी पढ़ें: जंग छिड़ जाए तो उत्तर कोरिया कितना खतरनाक हो सकता है?  

दूसरे देशों के हैकर्स जैसे चीन और नॉर्थ कोरिया के हैकर्स आर्थिक चोरी के लिए बदनाम हैं, जबकि रूस का ये समूह थिंक टैंकों से आइडिया की चोरी करता है. साल 2014 में सबसे पहले अमेरिकी साइबर सिक्योरिटी फर्म क्राउडस्ट्राइक ने इस ग्रुप पर आरोप लगाया कि ये आइडिया की चोरी करता है. ये टारगेट पर वार करने के लिए अपने टूल्स और तरीके लगातार बदलता रहता है ताकि वो पकड़ में न आए.

16 जुलाई को अमेरिका, कनाडा और यूके ने एक संयुक्त बयान जारी करके कहा कि उन्हें शक है कि रूस वैक्सीन से जुड़ी अहम जानकारियां चुराने की कोशिश कर रहा है. और वो इसके लिए इसी ग्रुप की मदद ले रहा है. फेडरल ब्यूरो ऑफ इनवेस्टिगेशन ने साफ कहा कि हैकर्स वैक्सीन से जुड़े हेल्थ डाटा, इलाज और फॉर्मूला चुराने की कोशिश कर रहे हैं. हालांकि बयान से ये साफ नहीं हुआ कि क्या डाटा चुराया भी जा चुका है. बयान में ये डर भी जताया गया कि दूसरे देश भी अब टारगेट हो सकते हैं.

अमेरिकी इंटेलिजेंस का सारा फोकस इसपर है कि कैसे रूस को वैक्सीन फॉर्मूला चुराने से रोक सके सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)

ईरान के हैकर्स भी कतार में हैं. डेली मेल की रिपोर्ट के मुताबिक, कोरोना वायरस पर काम कर रहे ब्रिटिश इंस्टीट्यूट पर ईरान से साइबर अटैक किया गया. रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रिटेन के नेशनल साइबर सिक्योरिटी सेंटर ने कहा है कि कोरोना से जुड़े एक्सपर्ट और इंस्टीट्यूट पर साइबर अटैक की घटनाएं बढ़ गई हैं. सेंटर साइबर अटैक से लड़ने के लिए 24 घंटे काम कर रहा है.

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अमेरिका की हालत सबसे ज्यादा खराब है. वहां मॉडर्ना फार्मा कंपनी वैक्सीन के ट्रायल में सबसे एडवांस स्टेज पर पहुंच चुकी है. चर्चा है कि वो नवंबर में वैक्सीन ले आएगी. इस सबके बीच उसपर लगातार साइबर हमले हो रहे हैं. इसी कारण अमेरिकी इंटेलिजेंस, जो आमतौर पर सैन्य मोर्चों पर रूसी खतरे को देखता रहता है, फिलहाल उसका सारा फोकस इसपर है कि कैसे रूस को वैक्सीन फॉर्मूला चुराने से रोक सके.

अमेरिका ने अपने यहां ह्यूस्टन के चीनी दूतावास को हैकिंग के डर से ही बंद करवाया- सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)

चीन के हैकर इसपर दो तरीके से काम कर रहे हैं. पहले तरीके के तहत चीन ने WHO में अपनी ताकत का इस्तेमाल करते हुए वे सारी जानकारियां सबसे पहले पा ली होंगी, जो कोरोना वायरस की वैक्सीन बनाने में जरूरी हैं. कम से कम फिलहाल तो यही माना जा रहा है. इसके अलावा वो एडवांस स्टेज में जा चुके रिसर्च में सेंध लगाने की कोशिश कर रहा है. खुफिया एजेंसी FBI ने भी इस बारे में रिसर्च लैब्स को चेतावनी दी है.

FBI के मुताबिक अमेरिका ने अपने यहां ह्यूस्टन के चीनी दूतावास को इसलिए ही बंद करवाया. कथित तौर पर उस दूतावास के जरिए चीन के हैकर्स बायोमेडिकल रिसर्च को हैक कर रहे थे.

अब सवाल ये उठता है कि वैक्सीन जब आने ही वाली है तो इसे हैक करने की क्या जरूरत! इसका जवाब आसान है. कोरोना वायरस संक्रमण को सदी की सबसे बड़ी महामारी माना जा रहा है. ऐसे में जो भी देश सबसे पहले वैक्सीन लाने और उसे बाजार में लाने में कामयाब हो जाए, वो आर्थिक के अलावा राजनैतिक तौर पर भी काफी अहम हो जाएगा. एक और वजह ये भी है कि कथित तौर पर चीन और रूस जैसे देश, शॉर्टकट खोज रहे हैं ताकि ज्यादा संसाधन लगाए बिना वो वैक्सीन बना लें.


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